Happy New Year 2018 Wish
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- December 02, 2017
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Hindi Poem
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Unknown
- November 29, 2017
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Good Morning Images
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Unknown
- November 26, 2017
बुलेट ट्रेन की कहानी, एक गरीब की जुबानी
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Unknown
- November 20, 2017
बुलेट ट्रेन की कहानी, एक गरीब की जुबानी
जैसे ही ट्रेन रवाना होने को हुई, एक औरत और उसका पति एक ट्रंक लिए डिब्बे में घुस पडे़। दरवाजे के पास ही औरत तो बैठ गई पर आदमी चिंतातुर खड़ा था। जानता था कि उसके पास जनरल टिकट है और ये रिज़र्वेशन डिब्बा है। टीसी को टिकट दिखाते उसने हाथ जोड़ दिए। ये जनरल टिकट है। अगले स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चले जाना। वरना आठ सौ की रसीद बनेगी। कह टीसी आगे चला गया। पति-पत्नी दोनों बेटी को पहला बेटा होने पर उसे देखने जा रहे थे।सेठ ने बड़ी मुश्किल से दो दिन की छुट्टी और सात सौ रुपये एडवांस दिए थे। बीबी व लोहे की पेटी के साथ जनरल बोगी में बहुत कोशिश की पर घुस नहीं पाए थे। लाचार हो स्लिपर क्लास में आ गए थे। साब, बीबी और सामान के साथ जनरल डिब्बे में चढ़ नहीं सकते।हम यहीं कोने में खड़े रहेंगे।बड़ी मेहरबानी होगी। टीसी की ओर सौ का नोट बढ़ाते हुए कहा। सौ में कुछ नहीं होता। आठ सौ निकालो वरना उतर जाओ। आठ सौ तो गुड्डो की डिलिवरी में भी नहीं लगे साब।नाती को देखने जा रहे हैं।गरीब लोग हैं, जाने दो न साब। अबकि बार पत्नी ने कहा। तो फिर ऐसा करो, चार सौ निकालो।एक की रसीद बना देता हूँ, दोनों बैठे रहो।ये लो साब, रसीद रहने दो।दो सौ रुपये बढ़ाते हुए आदमी बोला। नहीं-नहीं रसीद दो बनानी ही पड़ेगी।देश में बुलेट ट्रेन जो आ रही है।एक लाख करोड़ का खर्च है।कहाँ से आयेगा इतना पैसा ? रसीद बना-बनाकर ही तो जमा करना है।ऊपर से आर्डर है। रसीद तो बनेगी ही। चलो, जल्दी चार सौ निकालो।वरना स्टेशन आ रहा है, उतरकर जनरल बोगी में चले जाओ। इस बार कुछ डांटते हुए टीसी बोला। आदमी ने चार सौ रुपए ऐसे दिए मानो अपना कलेजा निकालकर दे रहा हो। पास ही खड़े दो यात्री बतिया रहे थे।" ये बुलेट ट्रेन क्या बला है ? बला नहीं जादू है जादू।बिना पासपोर्ट के जापान की सैर। जमीन पर चलने वाला हवाई जहाज है, और इसका किराया भी हबाई सफ़र के बराबर होगा, बिना रिजर्वेशन उसे देख भी लो तो चालान हो जाएगा। एक लाख करोड़ का प्रोजेक्ट है। राजा हरिश्चंद्र को भी ठेका मिले तो बिना एक पैसा खाये खाते में करोड़ों जमा हो जाए। सुना है, "अच्छे दिन " इसी ट्रेन में बैठकर आनेवाले हैं। उनकी इन बातों पर आसपास के लोग मजा ले रहे थे। मगर वे दोनों पति-पत्नी उदास रुआंसे. ऐसे बैठे थे मानो नाती के पैदा होने पर नहीं उसके शोक में जा रहे हो। कैसे एडजस्ट करेंगे ये चार सौ रुपए? क्या वापसी की टिकट के लिए समधी से पैसे मांगना होगा? नहीं-नहीं। आखिर में पति बोला- " सौ- डेढ़ सौ तो मैं ज्यादा लाया ही था। गुड्डो के घर पैदल ही चलेंगे। शाम को खाना नहीं खायेंगे। दो सौ तो एडजस्ट हो गए। और हाँ, आते वक्त पैसिंजर से आयेंगे। सौ रूपए बचेंगे। एक दिन जरूर ज्यादा लगेगा। सेठ भी चिल्लायेगा। मगर मुन्ने के लिए सब सह लूंगा।मगर फिर भी ये तो तीन सौ ही हुए। ऐसा करते हैं, नाना-नानी की तरफ से जो हम सौ-सौ देनेवाले थे न, अब दोनों मिलकर सौ देंगे। हम अलग थोड़े ही हैं। हो गए न चार सौ एडजस्ट।" पत्नी के कहा। " मगर मुन्ने के कम करना....""
और पति की आँख छलक पड़ी। मन क्यूँ भारी करते हो जी। गुड्डो जब मुन्ना को लेकर घर आयेंगी; तब दो सौ ज्यादा दे देंगे। "कहते हुए उसकी आँख भी छलक उठी। फिर आँख पोंछते हुए बोली-" अगर मुझे कहीं प्रधानमंत्री जी मिले तो कहूंगी-" इतने पैसों की बुलेट ट्रेन चलाने के बजाय, इतने पैसों से हर ट्रेन में चार-चार जनरल बोगी लगा दो, जिससे न तो हम जैसों को टिकट होते हुए भी जलील होना पड़े और ना ही हमारे मुन्ने के सौ रुपये कम हो।" उसकी आँख फिर छलके पड़ी। अरी पगली, हम गरीब आदमी हैं, हमें वोट देने का तो अधिकार है, पर सलाह देने का नहीं। रो मत...
यहा हम गरीबो के भावनाओं से खेला जाता हैं!
अपर श्रेणी की जरूरतों को पूरा करने के साथ रेल मंत्री जी को ये भी सोचना चाहिए की एक इस देश में गरीब भी यात्रा करते हैं। कसम से मेरे दिल से एक बात निकली, क्या इस देश में घूसखोरी इंसानियत से बढ़कर है, क्या इस देश का हर काम गरीबो का खून निचोड़ कर होता है, ये कहानी लिखते वक़्त ये आँखे नम गयी।
कोई गलती हुयी हो तो क्षमा प्राथी हूँ।
एक सच्चा हिंदुस्तानी
जय हिन्द।
विनम्र प्रार्थना है जो भी इस कहानी को पढ़ चूका है, उसे इस घटना से शायद ही इत्तिफ़ाक़ हो पर ये कहानी शेयर करे कॉपी पेस्ट करे पर रुकने न दे शायद रेल मंत्रालय जनरल बोगी की भी परिस्थितियों को समझ सके। उसमे सफर करने वाला एक गरीब तबका है जिसका शोषण चिर कालीन से होता आया है।
दुबारा से जय हिन्द,
आपका अपना
सचिन मिश्रा
धन्यवाद।
भूखा बच्चा
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Unknown
- November 18, 2017
गरमी का मौसम था, मैने सोचा काम पे जाने से पहले गन्नेका रस पीकर काम पर जाता हूँ।एक छोटे से गन्ने की रस की दुकान पर गया !! वह काफी भीड-भाड का इलाका था, वहीं पर काफी छोटी-छोटी फूलो की, पूजा की सामग्री ऐसी और कुछ दुकानें थीं। और सामने ही एक बडा मंदिर भी था , इसलिए उस इलाके में हमेशा भीड रहती है ! मैंने रस का आर्डर दिया , मेरी नजर पास में ही फूलों की दुकान पे गयी , वहीं पर एक तकरीबन 37 वर्षीय सज्जन व्यक्ति ने 500 रूपयों वाले फूलों के हार बनाने का आर्डर दिया , तभी उस व्यक्ति के पिछे से एक 10 वर्षीय गरीब बालक ने आकर हाथ लगाकर उसे रस की पिलाने की गुजारिश की !! पहले उस व्यक्ति का बच्चे के तरफ ध्यान नहीं था , जब देखा....तब उस व्यक्ति ने उसे अपने से दूर किया और अपना हाथ रूमाल से साफ करते हुए" चल हट ...." कहते हुए भगानेकी कोशिश की !! उस बच्चे ने भूख और प्यास का वास्ता दिया !! वो भीख नहीं मांग रहा था , लेकिन उस व्यक्ति के दिल में दया नहीं आयी !! बच्चे की आँखें कुछ भरी और सहमी हुई थी, भूख और प्यास से लाचार दिख रहा था !! इतने में मेरा आर्डर दिया हुआ रस आ गया !!
मैंने और एक रस का आर्डर दिया उस बच्चे को पास बुलाकर उसे भी रस पीलाया !! बच्चे ने रस पीया और मेरी तरफ बडे प्यार से देखा और मुस्कुराकर चला गया !! उस की मुस्कान में मुझे भी खुशी और संतोष हुआ.......लेकिन. ....वह व्यक्ति मेरी तरफ देख रहा था, जैसे कि उसके अहम को चोट लगी हो !! फिर मेरे करीब आकर कहा"आप जैसे लोग ही इन भिखारियों को सिर चढाते है"मैंने मुस्कराते हुए कहा आपको मंदिर के अंदर इंसान के द्वारा बनाई पत्थर की मूर्ति में ईश्वर नजर आता है, लेकिन ईश्वर द्वारा बनाए इंसान के अंदर ईश्वर नजर नहीं आता है..........मुझे नहीं पता आपके 500 रूपये के हार से आपका मंदिर का भगवान मुस्करायेगा या नहीं, लेकिन मेरे 10 रूपये के चढावे से मैंने भगवान को मुस्कराते हुए देखा केवल धन होने से लोगो की मदद नही कर सकते आप,,, उसके लिए सच्चे मन की भी जरुरत है।
आपका अपना सचिन मिश्रा। दुवाओं में याद रखियेगा।
उरी आतंकवादी हमला
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Unknown
- November 15, 2017
"अंधों को दर्पण क्या देना, बहरों को भजन सुनाना क्या.?
जो रक्त पान करते उनको, गंगा का नीर पिलाना क्या.?"
जो रक्त पान करते उनको, गंगा का नीर पिलाना क्या.?"
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"हमने जिनको दो आँखे दीं, वो हमको आँख दिखा बैठे.!
हम शांति यज्ञ में लगे रहे, वो श्वेत कबूतर खा बैठे.!"
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"वो छल पे छल करता आया, हम अड़े रहे विश्वासों पर.!
कितने समझौते थोप दिए, हमने बेटों की लाशों पर.!"
"अब लाशें भी यह बोल उठीं, मतअंतर्मन पर घात करो.!
"दुश्मन जो भाषा समझ सके, अब उस भाषा में बात करो.!"
"वो झाड़ी है, हम बरगद हैं, वो है बबूल हम चन्दन हैं
"वो है जमात गीदड़ वाली, हम सिंहों का अभिनन्दन हैं.!"
"ऐ पाक तुम्हारी धमकी से, यह धरा,नहीं डरने वाली.!
"यह अमर सनातन माटी है, ये कभी
नहीं मरने वाली.!"
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"तुम भूल गए सन अड़तालिस, पैदा होते ही अकड़े थे.!
हम उन कबायली बकरों की गर्दन हाथों से
पकडे थे.!"
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"तुम भूल गए सन पैसठ को, तुमने पंगा कर डाला था.!
छोटे से लाल बहादुर ने तुमको नंगा कर डाला था.!"
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"तुम भूले सन इकहत्तर को, जब तुम ढाका पर ऐंठे थे.!
नब्बे हजार पाकिस्तानी, घुटनों के बल पर बैठे थे.!"
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"तुम भूल गए करगिल का रण, हिमगिरि पर लिखी
कहानी थी.!
इस्लामाबादी गुंडों को जब याद दिलाई नानी
थी.!"
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"तुम सारी दुर्गति भूल गए, फिर से बवाल कर बैठे हो.!
है उत्तर खुद के पास नहीं हमसे सवाल कर बैठे
हो.!"
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"बिगड़ैल किसी बच्चे जैसे आलाप तुम्हारे लगते हैं.!
तुम भूल गए हो रिश्ते में हम बाप तुम्हारे लगते हैं.!"
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"बेटा पिटने का आदी है, बेटा पक्का जेहादी
है.!
शायद बेटे की किस्मत में, बर्बादी
ही बर्बादी है.!"
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"तेरी बर्बादी में खुद को, बर्बाद
नहीं होने देंगे.!
हम भारत माँ के सीने पर जेहाद नहीं होने
देंगे.!"
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"तू रख हथियार उधारी के, हम अपने दम से लड़
लेंगे.!
गर एटम बम से लड़ना हो तो एटम बम से लड़ लेंगे.!"
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"जब तक तू बटन दबायेगा, हम पृथ्वी नाग चला देंगे.!
तू जब तक दिल्ली ढूंढेगा, हम पूरा पाक जला देंगे.!"
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( "भारत माँ के वीर सापूतो को सचिन मिश्रा का शत्-शत् नमन.!" )
"वन्दे-मातरम्"




























